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मैं और मेरी वो

मैं और मेरी वो

जब हुई हमारे प्यार की वो पहली शुरुआत
आँखों में आँखे पर न होठों पर कोई बात
सुनने को मेरा दिल बेकरार, उसकी वो मीठी सी आवाज़
कहना भी कुछ चाहूँ फिर ज़ुबां भी ना दे साथ
कुछ ऐसी रही हमारी अनोखी सी मुलाक़ात।

वो सावन कि पहली बारिश पर उसकी हल्की सी मुस्कान
सवेरे का सूरज भी जैसे उसपर ही हो कुर्बान
रातें बिखेरती सितारों की रोशनी
जैसे उसको देखने ही निकला हो आज चांद
कुछ ऐसा है उसका नूर-ए-अंदाज़।

छूने से इतरा जाए जैसे हो कोई गुल
महकती हुई बस जाए सांसों में जैसे इत्र आब्शार
आँखों में बसती है समंदर सी गहराई
मासूमियत ओढ़े वो, जैसे हो बादलों में सांझ
कुछ ऐसी है वो और उसपर मेरा दिल बेईमान।

प्यार की मूरत नहीं प्यार ही है हूबहू
रास्ता हूँ मैं, और मेरी मंज़िल वो
बिखर जाऊं मैं, मुझमें सिमटे जब वो
मैं अधूरा, मुझ बिन पूरी न वो
कुछ ऐसा है हमारा लफ़्ज़ों में प्यार।
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