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डर

डर

बच्चा, बूढ़ा या हो जवान,
सबको लगता है डर।
नारी हो या नर,
सबके अपने-अपने हैं डर।

किसी को टीचर की मार कर डर,
तो किसी को बाॅस की डांट का डर।
नौकर को मालिक का डर,
मालिक को अपनी सुरक्षा का डर।

एक औरत की तो पूरी ज़िंदगी ही,
गुज़र जाती है डर के एहसास में।
बचपन से ही सहमी सी, दबी सी,
रहती है डर के आवास में।

डर के साये में, कोई भी आज तक,
खुश नहीं रह पाया है।
हर वक्त एक अजीब सी घुटन से,
वह रहता घबराया है।

इससे बचने का है,
बस एक ही रास्ता,
कुछ भी काम मत करो ऐसा,
कि डर से पड़े वास्ता।

जीवन हो ग़र खुली किताब,
तो रखना ना पड़े कोई हिसाब।
क्या बताना है क्या छुपाना,
ना रखना पड़े याद।

डर की फिर क्या औकात,
आराम से सुनो अंतर्नाद।

उजली रखो सदा,
अपने जीवन की चादर।
कर्म ना करो ऐसा,
कि सहना पड़े किसी का अनादर।

आचरण हो शुद्ध
और कर्म हों शुभ,
तो ना रहे किसी का डर,
ना हो जीवन में कुछ भी अशुभ।

जो होगा सो प्रभु मनभावन,
डरने की क्या बात है।
डर नहीं है तूफ़ानों का,
प्रभु जो अपने साथ है।
1 Comment
  • Shweta Kacker
    Posted at 14:33h, 08 October Reply

    Beautiful

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