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डर

डर

तुम क्यों नही हो।
एक बच्चा जिसकी माँ बचपन मे गुजर जाती है।
जब वो दर दर की ठोकरे खाता रहता है।
माँ की प्यार भरी नज़रो को तरसता रहता है।
तो वो खुद से न जाने कितनी बार सवाल करता है।
माँ तुम मेरे साथ हम सबके बीच क्यों नही हो।
दुनिया के हज़ारो ताने जब वो सुनता है।
लोगों के अत्याचारो को जब वो सहता है।
अपने रिश्तेदार को जब वो पराया पाता है।
तो वो खुद से न जाने कितनी बार सवाल करता है।
माँ तुम मेरे साथ हम सबके बीच क्यों नही हो।
जब वो भूखा होता है उसे कोई खाना नही पूछता।
उसको चोट लगने पर जब कोई मरहम नही लगाता।
उसके रोने पर उसे गले से लगाकर कोई चुप नही कराता।
तो वो खुद से न जाने कितनी बार सवाल करता है।
माँ तुम मेरे साथ हम सबके बीच क्यों नही हो।
जब वो डर कर छुपने के लिए माँ का आँचल नही पाता।
जब उसके नखरे उठाने के लिए वो माँ को पास नही पाता।
उसके रूठने पर जब उसे कोई नही मनाता।
तो वो खुद से न जाने कितनी बार सवाल करता है।
माँ तुम मेरे साथ हम सबके बीच क्यों नही हो।
जब उसे कुछ चाहिए और वो माँग नही पाता।
अपने बचपन को जी भर के वो जी नही पाता।
इस भीड़ में वो जब खुद को ढूंढ नही पाता।
तो वो खुद से न जाने कितनी बार सवाल करता है।
माँ तुम मेरे साथ हम सबके बीच क्यों नही हो।
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