Custom Pages
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7']
Portfolio
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7'] [vc_separator type="transparent" position="center" up="12" down="16"]
 

लॉक डाउन से सीख

लॉक डाउन से सीख

कभी गिरती कभी उठती, ऐसे संभलती जाती हूँ।
लॉक डाउन से जो सीखा, वो मैं तुम्हे बताती हूँ।

हुए दहलीज़ के भीतर, तो मालूम ये हुआ,
उनका काम है बस कम, के ज्यादा मैं सताती हूँ।

वक़्त घर पे जो बीता, तो कमिया नज़र आई।
इश्क़ था ज़रा गहरा, ज़रा सा कम जताती हूँ।

तितलियों से मिले जो, नाज़ुक से मेरे रिश्ते।
रूठे जो उन्हें अब मैं, दिलेरी से मनाती हूँ।

घर पर बने थे हम, हमारी रेल की पटरी।
प्लेटफार्म बनाकर मैं, परिभाषित कराती हूँ।

ज्यादा कुछ नही बस वो, रेगुलेटर चला देते,
मैं बस उन्ही के काम मे, कीबोर्ड चलाती हूँ।

सुबह की दौड़ में बस, मैं तन्हा हुआ करती।
अब उनके साथ अपनी, ज़रा सी दौड़ लगती हूँ।

पहले बहती सी नदिया थी, न स्थिर हुआ करती।
अब उछलती नदियों सी, मैं छलकती ही जाती हूँ।

लॉकडाउन में सीखा है, जीवन जीते है कैसे।
जीवन गीत जो लिखा, वो मैं गुनगुनाती हूँ।
No Comments

Post A Comment