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विशेष उपहार

विशेष उपहार

आज देता तुम्हें में
विशेष एक उपहार
ना करना तिरस्कृत इसे
ना करना उपहास।

चाह है इसकी सेठों को
चाह है इसकी सम्राटों को
पर भंडार उपहार का मेरा
है उपलब्ध सिर्फ़ निर्धनों को।

लिए समेटा है इसमें
किंचित् जो प्रेम मेरा
हूँ हर्षित आज बड़ा में
आया लिए उपहार तेरा।

स्थान रहे विशेष इसका
त्याग ना करना इसका
रखे सम्भाले हृदय समीप इसे
ओझल इसे ना कभी होने देना।

देता हूँ उपहार में स्वप्न मेरा
एक सुंदर सा यह संसार मेरा
करता निस्तारित धर्म मेरा
तुम्हें सहारा देना कर्म मेरा।

या हो पतित या दलित
या हो व्यथित या भ्रमित
स्वप्न मेरे है दुनिया में
सभी के लिए समान प्रेषित।

लिए भर नीर नैनों में मेरे
दूँ नद-तीर सूखे होटों को तेरे
प्यार के हैं जो प्यासे मेरे
लूटा दूँ दोनों हाथों से मेरे।

हैं प्रेम से बुने दिग्स्वप्न मेरे
है देते निरंतर पुकार तुझे
आ थाम इन्हें हाथों में तेरे
है तेरे लिए विशेष उपहार ये मेरा।
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