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प्रेरणा

प्रेरणा

पेंसिल से फिर कलम पकड़ना सिखाया.
लफ़्ज़ों को काग़ज़ पे उभरना सिखाया।

स्याही बन कर जो रवां कर दे शख्सियत अपनी,
उनके हर लफ़्ज़ों में अश्क भरना सिखाया।

आज भी जिंदा है पापा आप मेरी हर शायरी में,
जिसने मुझे गिरना, चलना फिर सम्भलना सिखाया।

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