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तारा

तारा

अल्हड़ बचपन की भोली बातें,
तारों की छांव में सोती रातें,
जब रोज़ हुआ करती थीं,
चाँद व तारों से मुलाकातें।
दिन भर रहता था इंतज़ार रात का,
किस्से कहानियों की सौगात का।
जब तारे गिनने की,
नाकाम कोशिश किया करते थे।
जब तारों को भी हम,
नाम दिया करते थे।
तब अपना भी एक हुआ करता था सपना,
कैसे भी करके छू लूँ अंबर को,
तारों की नगरी में घर हो अपना।
बन जाऊँ मैं भी ऐसा ही इक तारा,
प्यारा-प्यारा, टिम-टिम करता तारा।
साथ ही उनके मिल जाऊँ,
नाचूँ, गाऊँ,धूम मचाऊँ।
लेकिन बचपन क्या छूटा,
टूट गया मेरा सपना।
सत्य यह हुआ प्रकट,
कि हो सकते हैं कुछ सपने,
अपने परिश्रम के बल से साकार।
लेकिन सच नहीं हो सकता हर सपना।
तारा बनना है यदि आकाश का,
तो अपने अध्ययन व मेहनत से,
तय करना होगा फासला धरा व नभ का।
ताकि देखते ही सब कहें, यह है तारा फलक का।
सफलता के सोपान पर चढ़कर,
बन जा अंबर का तारा।
चम-चम, चम-चम चमकेगा,
फिर तेरा भाग्य सितारा।
1 Comment
  • Shweta Kacker
    Posted at 14:12h, 08 October Reply

    Star performance

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