Custom Pages
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7']
Portfolio
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7'] [vc_separator type="transparent" position="center" up="12" down="16"]
 

कोरोनाकाल – एक सबक

थे कडुवे रिश्ते, कोरोना ने खत्म ही कर दिये..
खेल रहा था इंसान पहले, अब सृष्टि खेल रही है।

लेता है बदला इंसान, अब सृष्टि ले रही है।
हर जगह समान नही था, कोरोनकाल में जीवन।

कहीं थी परिवार में खुशी का आलम, कहीं था मौत का हाहाकार।
कहीं था अकेलापन, तो कही पूरा परिवार साथ था।
अकेलेपन में मर रहा था कोई, तो सब के लिए नए व्यंजन बना रहा था कोई।
खो दिया किसी ने अपनो को तो, अपनापन पा लिया किसी ने।
नहीं था एक समान कोरोनाकाल सबके लिए।।

No Comments

Post A Comment