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एक सच्चा साथी

एक सच्चा साथी

लेकर यूँ चले थे कारवां साथ यारों के,
होकर सवार मदमस्त घने बादलों पे,
मंज़िल थी वो दूर लहराती हुई घाटियाँ
पर हक़ीक़त में,
थी बांधे हमारे सपनों को कई सारी ज़िम्मेदारियाँ।

थामा होता हाथ यारों ने ज़बरदस्ती जो मगर,
हम भी कुछ सोचकर उड़ चलते जो अगर
सच्चाई के धरातल पर बिखरे हुए थे
ज़िंदगी के पन्ने कई,
समेटने में उन्हें भला और कौन करता अपनी मदद।

एक अदद सच्चे साथी का रहा उम्र भर इंतेज़ार,
जो रहे साथ अपने चाहे आए दुःख बारम्बार,
लेकिन रह गए थे तनहा शामे महफ़िल के,
खिले हुए शामियानों में,
ढूँढ रहे थे अपना कोई उन अनजान मेहमानों में।

थे जो हम यूँ खोए खोए तनहा एक कोने में,
थी सिलवटें कई हमारे सुस्त पड़े दुखी चेहरे पे,
तभी पीछे से आकर किसी ख़ुदा के एक फ़रिश्ते ने
थामा जो हमारा हाथ,
कहते हुए कि निभाएगा साथ हमारा सातों जीवन में।

हुए काफ़ूर सब चिंता और दुःख हमारे चेहरे से,
देर ही सही लेकिन दिखा ख़ुदा का नूर तेरे चेहरे पे,
था सुकून तेरी निगाहों में ख़ुदा की इनायत हो जैसे
बरस रही थी जो मुझपर,
हुई क़बूल मेरी उम्र भर की दुआ हो जैसे।
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