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भगतसिंह

भगतसिंह

अपने लहू से जो इंकलाब ज़िंदाबाद लिख गए।
बिना डरे जो फांसी के फंदे पर झूल गए।
क्या लिखूं मैं उन वीर जवानो के लिए।
जो हसते हसते वतन के लिए कुर्बान हो गए।
बादल बनकर वो आग के अंगारों पर बरस गए।
अपने शीश जो मौत की तलवार पर रख गए।
किन शब्दो मे बयाँ करू में उनकी आत्मकथा।
जो हसते हसते वतन के लिए कुर्बान हो गए।।
अपनी माँ को जिसने तड़पता हुआ छोड़ दिया।
देश के लिए जिसने हर रिश्ता हसते हुए छोड़ दिया।
कैसे लिखू मैं भगतसिंह जैसे देशभक्त को।
जो हसते हसते वतन के लिए कुर्बान हो गए।

ना जाने कैसे सोयी होगी उस रात वो माँ।
जिसने अपने लाल भगत सिंह को खोया।
कैसे छुपाए होगा उस माँ ने अपनी तड़प।
जिसके लाल हसते हसते वतन के लिए कुर्बान हो गए।

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