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इंकलाब

इंकलाब

फक़त खामोशी छायी है इससे तो सैलाब अच्छा,
ऐसी हकीकत में मौजूद रहने से तो ख्वाब अच्छा।

आफ़ताब के नूर से रूबरू होने का दिल नहीं,
तेरी फ़ुर्क़त में सारी रात का ये महताब अच्छा।

बगावत पर उतर आये है वो पंरिदे आज़ादी को,
चुप रहकर ज़ुल्म सहने से तो इंकलाब अच्छा।

लब तरसते है उनके एक-एक बूँद 'आब' के लिए,
कूचा-ए-जाँ इस आलम में तो गिर्दाब अच्छा।

रहने लायक है इसलिए तो सभी बर्बाद कर रहे हैं,
फिर क्यों ना कहे, धरती से जलता सीमाब अच्छा।
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