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अजब-गजब की प्रेम कहानी

अजब-गजब की प्रेम कहानी

सुबह का समय था । मैं अचानक अपने कमरे की खिड़की से अंगड़ाइयाँ लेता हुआ बाहर झांका तो देखा झमाझम बारिश हो रही थी, मौसम सुहावना नजर आ रहा था, मन भी मचल रहा था, और हो भी क्यों ना? बसंत के शुरुआत की पहली बारिश जो थी। रोकना चाहा खुद को मगर प्राकृतिक सौंदर्य ने मनमोह लिया और मैं बिना छाते के पास के सड़क पर निकल पड़ा। गांव की सड़क पर जो खुशबू आती थी वही मानो स्वर्ग की सहानुभति सी लग रही थी। मैं थोड़ा थोड़ा भींग रहा था मगर दिल को सुकून मिल रहा था, पहली बारिश और वो भी रिमझिम फुहारों से मुझे अपने ओर आकर्षित कर रही थी।
तभी अचानक एक अजब घटना घटी, सड़क के दूसरी तरफ से दौड़ती हुई एक लड़की मेरे पास आकर अचानक ठहर गई। लड़की सुंदर थी और गांव में उसे पहली बार देख रहा था, मैं तुरंत फिल्मी दुनियाँ में खो गया दिल में घंटी शोर मचाने लगी और तो और गुलाबी कपड़ों में वो तो स्वर्ग की अप्सरा लग रही थी। इतनी सुंदर थी कि दिल गुनगुनाकर कहने लगा चल कुछ आजमातें है ,कुछ देर तक तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, फिर वो नजदीक आ गई। मैं कुछ पूछता कि वह पूछ बैठी। पागल हो क्या? जो बीच सड़क पर बारिश में भींग रहे हो। मैं भी स्तब्ध रह गया, बिना जान पहचान के ही इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा रही है, मैं भी चुप नहीं रहा, तुरंत बोल बैठा, हाँ मगर तुमको कैसे मालूम? फिर पूछा अगर मैं पागल हूँ तो तुम कितनी पागल हो, जो पागल से पूछ रही हो। बोलने में हिचकिचाई मगर बोली भी मुझे बारिश का मौसम पसंद है इसीलिए मस्ती कर रही हूँ। कुछ देर सोचने के बाद हम भी बोल बैठे, कि बारिश का मौसम मेरा दुश्मन है इसीलिए दुश्मन का डटकर सामना कर रहा हूँ। वो गुस्से में आकर बोली; तुम पागल भी हो और वाचाल भी। मैंने कहा कोई बात नहीं; तुम जो समझो। फिर बोली चलो झगड़ा छोड़ो एक बात बताओ यहाँ कोई झील है क्या? मैंने बोला, पहली बार गांव आई हो क्या? वो बोली जैसा तुम समझ लो? मैं मन ही मन सोच रहा था, क्या सोचे थे कि ऐसी होगी ये तो बिल्कुल भी भाव नहीं दे रही है। मैंने बोला चलो अपना नाम बताओ; यहाँ कब, किसके यहाँ आई है? वो बोलने लगी अरे तुम क्या करोगे जानकर? मैंने सोचा यह ऐसे नहीं मानेगी, मैंने कहा यहाँ झील तो नहीं है मगर शहरों की तरह ही एक झील नुमा एक नदी है। फिर बोली तब तो ठीक है चलो घूमने चलते हैं। मैंने बोला गांव की नदी है जहाँ तुम्हें नहाते हुए मवेशी और मानव एक साथ मिलेंगे, वह बोली कोई बात नहीं? मुझे भी मौका मिला और बोल दिया चलो चलते हैं घूमने। बारिश धीरे-धीरे छूट गई थी और सूर्य अपनी आरुषि किरणों के साथ वसुंधरा पर अपनी रोशनी से जलवे बिखेर रही थी।
कुछ देर पैदल चलने के बाद हमलोग नदी किनारे पहुंच गए, नदी देखकर वो काफी खुश हो रही थी। मुझे क्या मैं तो वहाँ रोज भैंस लेकर आया करता था? तभी उसकी नज़र नदी के बीचों-बीच स्थित पुलिया पर पड़ी जो काफी पुरानी थी। हम कभी कभार उस पर चढ़कर नहाया करते थे। वो एकदम से जिद करने लगी कि मुझे उस पर जाना है, मैंने कहा; देखो पुल पर जाने वाले रास्ते में पानी है और दोनों तरफ खाई, मगर वह काफी जिद करने लगी। मैंने कहा तुझे तैरना आता है वो बोली नहीं, मैंने कहा, कोई बात नहीं, तुम मेरा हाथ पकड़ कर पैर को देखते हुए आगे बढ़ना, फिसनले से बचना। वो बोली ठीक है तुम आगे बढ़ो, मैं सहम कर आगे बढ़ा ही था कि एक मेंढ़क सर के उपर से छलांग लगा दिया वो ज़ोर ज़ोर से मम्मी मम्मी चिल्लाने लगी, मैंने कहा मज़ा आ रहा है, वो बोली कोई बात नहीं मैं जीव-विज्ञान की विद्यार्थी हूँ, मुझे हँसीं आने लगी मैं हंसने लगा। वो मुझे गुस्से से घुर घुर कर देखने लगी। किसी तरह डरते हुए आखिरकार पुलिया के पास पहुंच गए । वो झट से पुलिया के उपर पहुंच गई और जोड़ जोड़ से चिल्लाने लगी , इ लव यू, इ लव यू! मैंने सोचा यह ये क्यों कह रही है? इतना जानकारी तो मुझे फिल्मों से पता चल गया था कि इसका अर्थ क्या होता है? मैं भी झट से ऊपर चढ़कर जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया,इ हेट यू! जैसे ही मैंने चिल्लाना शुरु किया वह अचानक चुप हो गई और बोली तुम्हें मेरे मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं। मैंने भी बोल दिया यहाँ किसको बोल रही है? बीच नदी में, खुला आसमान है, सुनने वाला कोई नहीं है मेरे सिवा। वह जोर जोर से हंसने लगी, और बोली सही में तुम पागल लग रहे हो। मैंने बोला तो ठीक है मैं जाता हूँ तुम अकेले यहाँ से आ जाना। उसका क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और बोली कुछ नहीं तुम अच्छे हो चलो अब घर चलते हैं, मेरी बहन मेरा इंतजार कर रही होगी। मैं फिर सोच में पड़ गया यह आखिरी यहाँ किसके यहाँ आई है? फिर सोचा चलो कोई बात नहीं पता तो कर ही लूंगा? फिर किसी तरह पुलिया से नीचे उतर कर पानी में भीगते हुए किनारे पर आया ।
मैं मन ही मन सोच रहा था कि इसे एक बार फिर से टोकूं कि ये कौन है? वो बोल बैठी; तुम्हारा ही नाम संतोष है; अब मैं एका एक ठहर सा गया एक तरफ खुशी हो रही थी तो दूसरी तरफ डर लग रहा था। मुझे अब भी नहीं समझ में आ रहा था आखिर यह मेरा नाम कैसे जानती है? बहुत कुछ सोचने समझने के बाद : मैंने बोला हाँ मगर तुझ को कैसे मालूम? वो बोली ऐसे ही। फिर मैंने बोला नहीं बताओ। वो बोली यहाँ मेरी बहन की शादी हुई है और मैं पहली बार आपके गांव में आई हूँ, मैने अपनी बहन से गांव घुमाने को कहा तो वो बोली मैं यहाँ शहर की तरह घर से बाहर नहीं निकल पाता, अगर घूमना है तो अभी सड़क पर सीधे जाओ वहाँ कोई लड़का बारिश में भीगता हुआ नजर आएगा वो तुम्हें गांव का हर जगह घुमा देगा। मैं तो मन ही मन गदगद हो गया था, लेकिन अब भी कुछ स्पष्ट नहीं था, मैंने सोचा खैर छोड़ो जो भी है मुझे जानती है। अब धीरे-धीरे कुछ कुछ समझ में आने लगा था तो मैंने गांव के शिव मंदिर में घूमने का प्रस्ताव रखा वह मान गई और हम लोग शिव मंदिर की तरफ चल दिए, जैसे ही मैं मंदिर के करीब पहुंचा ऐसा लग रहा था मानो मैंने कोई बड़ा गुनाह कर दिया, गांव के पूजा करे सभी आदमियों की नजर एकाएक एकत्रित होकर मुझे चुभने लगी और तो और मंदिर के पुजारी भी मुझे घूर घूर कर देखने लगा। सबके नजरों के तीखे प्रहार को सहते हुए मैं मंदिर के प्रथम द्वार पर पहुंच गया, प्रणाम कर मंदिर के अंदर जहाँ शिवलिंग स्थापित था वहाँ पहुंचा। किसी ने कुछ बोला तो नहीं मगर आँखों से सब कुछ बयाँ कर रहा था। मैंने सोचा बेटा यहाँ से निकल जाने में ही फायदा है, मैंने उससे कहा कि यहाँ से जल्दी चलो तुम्हारी दीदी तुम्हारा इंतजार कर रही होगी। वह भी बोली हाँ चलो।
कुछ दूर की चहलकदमी के बाद मैं अपने घर के ठीक सामने पहुंच चुका था। मैं अपना घर ना जाकर उसको उसके घर ले जाने का जिक्र किया वो मान गई और बोली चलो तुम्हारा भी इंतजार कर रही होगी। मुझे बार बार यह प्रश्न सता रही थी फिर सोचा चलो प्रश्न को हल कर ही दें। लगभग 50 मीटर चलने के बाद गांव के मुखिया श्री दिनेश त्रिवेदी जी का आलिशान महल नजर आया, इससे पहले मैं उसके बगल से गुजर जाता था मगर पहली बार उसके बंगले के अंदर जाने का मौका मिलता, तभी घर के अंदर से आवाज आई कि देखो आ गए दोनों, वहीं मुखिया जी अपनी कड़क मूछ को सहलाते हुए आगे आए और बोले इतनी देर तक कहाँ रंगरेलियां मना रहे थे। अभी घर को आए हो और हिम्मत तो देखो छौरी की छोरा भी साथ लाई है। मुखिया जी की इन बातों से मेरे कान का चादर मानो फट सा गया। मैं एकाएक गहरी सदमा में डूब सा गया, और मेरे सामने खड़ी वह लड़की काफी रोने लगी और रोते रोते बोल रही थी; मैंने कुछ नहीं किया इसने मुझे पास के नदी में जाकर नहलाया और जबरदस्ती की कोशिश की और तो और मंदिर जाकर विवाह करने को कह रहा था, मैंने मना कर दिया।
मैं लड़की की तरफ देखकर मन ही मन सोच रहा था, इसे पुलिया के गड्ढे में धकेल देते तो अच्छा होता। तभी उसकी बहन आई और अपनी बहन को अंदर ले गई, मैं वहीं ठहरा रहा मुखिया जी ने मेरे माँ–बाप को अपने नौकर से बुलाने को कहा। अब मैं मरता क्या नहीं करता? मुझे कुर्सी पर बैठा दिया गया कुछ देर बाद मेरी माँ और पिताजी दोनों आए और मुझे देख कर दोनों अपनी अपनी स्कूली ज्ञान का भंडार आरंभ कर दिया। मैं गुस्से में तिलमिला उठा और मुखिया जी की तरफ देख रहा था।
मैं देख ही रहा था की मुखिया जी और मेरे माँ बाप पिताजी जोर जोर से हंसने लगे। फिर कहानी में एक और बड़ा ट्विस्ट आ गया, मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। कुछ देर बाद मुखिया ने मेरे पिताजी से कहा तो क्या मैं रिश्ता पक्का समझूं। अब मेरे दिमाग में चल रही कहानी और जटिल होती चली गई, मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है यहाँ, कुछ देर पहले कितने गुस्से में थे सब मुझ पर इल्जाम, सवालात दागे जा रहे थे, गोली बारूद की तरह मुझ पर कहर बरसाए जा रहे थे, अचानक यह मानी के फूल कैसे बरसने लगे? मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा कि कहीं इसकी सोची हुई साज़िश तो नहीं है।
अब मुझे शत-प्रतिशत विश्वास होने लगा था यह इन लोगों की सोची हुई साजिश है। अब मेरे दिमाग में भी एक खुरपाती आइडिया सूझा, मैं झट से जमीन पर लेट कर खूब रोने लगा, खूब चिल्लाने लगा चिल्लाते चिल्लाते जोर-जोर से हंसने भी लगा, ऐसा लगने लगा कि मानो कि मैं पागल हो गया हूँ। बड़ी मशक्कत के बाद मैं शांत हुआ ।
अब मैं जब पूरी तरह समझ गया था तो नखरा करके क्या फायदा? मैंने भी मंजूरी दे दी और कह दिया कि रिश्ता मुझे भी मंजूर है। बस कुछ दिन बाद ही हमदोनों का विवाह हो गया और आज भी ऐसा ऐसा मज़ाक प्यार का एहसास कराने के लिए होता रहता है।
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