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औरत

औरत

सोचा लिखूंगी औरत के फक्र में दो लफ्ज़,
लिखने बैठी तो ये कलम हो गई कमज़र्फ,
इज़्ज़त बक्शी ही कहाँ इस आवाम ने,
सदियों से चला आ रहा है ये नागवार मर्ज़।
देते हैं दर्जा माँ-बहन का,
लगता है ये ताल्लुक है महज़ वहम का,
महज़ ऐसे मसलों पर आवाज़ें बुलन्द करने से क्या होगा,
देखो फिर एक नामुराद बेटी को ले गया।
फक्त औरत ही तो है, गर ये समझते हो तुम,
हाँ ये रौब तो होगा ही, आखिर बेटी को कोख में मार के जने जो गए हो तुम,
पैदाइश भी मुमकिन नहीं तुम्हारी औरत के बिना,
मगरूरियत किस बात की, बगैर उसके कुछ भी नहीं हो तुम
हमारी हया को तुम अपनी कुव्वत समझ बैठे हो,
बस यही तो तुम भूल कर बैठे हो,
जलाल आ गया तो नहस कर देने की कुव्वत रखते हैं,
लगता है महाभारत और लंका दहन भूल बैठे हो।
मुनतफिक है सोच मेरी,
इख्तिलाफ़ पैदा नहीं करती,
मगर ज़रूरी है एहसानो का एहसास दिला दिया जाए,
क्योंकि एहसानो को अक्सर ही दुनिया भुला दिया करती।
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