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ख़्वाब और इरादे

ख़्वाब और इरादे

इरादे बुलंद करके उठी एक नारी,
हँसी खुशी से जीती वो,
ख़्वाबों को सजाती वो,
मगर हैवानियत के चलते,
उस पर रोक टोक लग जाती।
दृढ़ संकल्प लिए वो उठती,
अपनों को समझाती।
ख़्वाब उसका पढ़ने का,
जीवन में कुछ कर दिखाने का।
पर हैवानों के हाथ चढ़ गई,
ख़्वाब बिखर गए उसके जैसे,
उम्मीदों के तिनको के,
इंसाफ की चाहत में उसने,
दिन रात एक किये।
कभी ओस की बूंदों सी,
ठंडी वो पड़ जाती।
मगर इरादे पक्के थे,
इंसाफ मिला,
ख्वाबों को नई राहें मिली।
तिनके जोड़ना मुश्किल था,
मगर हार नहीं मानी थी।
सिलसिला यूँ ही चलता रहा,
ख्वाबों और इरादों का...।।
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