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एक पत्र ईश्वर के नाम

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हे मेरे परमपिता,
शत शत नमन।

कही है अपनी व्यथा आपसे कई बार रो-रोकर, हर बात के साक्षी हो आप ही प्रभु करुणाकर।
लेकिन आज लिखकर अपनी बात कहने का मिला है अवसर,
तो खूब बातें करनी है आपसे जी भर कर।
इतनी सुंदर सृष्टि का आपने किया है सृजन, कलकल बहती नदियां, हिमाच्छादित पर्वतमाला व हरे-भरे उपवन।
रहने को सुंदर घर, पहनने को वस्त्र व खाने को विविध व्यंजन,
हर पल आपने मुझे संभाला, हर कष्ट से उभारा बनकर दुखभंजन।
मेरे सब कार्य किये आपने, मुझे मान दिया यश दिया आपने।
बिन मांगे ही अपनी रहमतों से नवाजा आपने।
सामर्थ्य नहीं मुझ में जो कर सकूं प्रगट अपना आभार,
क्योंकि शब्द हैं मेरे सीमित और आप की महिमा है अपरंपार।

हे प्रभु एक विनती भी है मेरी आपसे,
सारी मानव जाति द्वारा किए गए गुनाहों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ आपसे।
मैं जानती हूँ ये अपराध हैं अक्षम्य, हमने आपके द्वारा बनाई गई प्रकृति का किया अंग-भंग।
उसे आदर देने की अपेक्षा, उसके प्रति अपनाया गलत ढंग।
उसी के फलस्वरूप आज सभी को मिली है, नज़रबंद होने की सज़ा।
सब को डरा दिया एक अदृश्य वायरस ने, जिसके लिए नहीं बनी अब तक कोई भी गिज़ा।
आप तो सब जानते ही हो प्रभु अंतर्यामी, आप ही हो, सकल विश्व के स्वामी।
कृपया सबके गुनाह बख़्श दीजिए व सबको शांति का दान दीजिए।
प्रभु सब के त्रास हर सकते हैं आप ही, सब को क्षमा भी कर सकते हैं आप ही।

इसीलिए आपके दर पर ही लगाई है गुहार, सुन लो प्रभु हमारी यह करुण पुकार।
मन ही मन बहुत हैं हम शर्मसार, तुम्हारी दया का ही है एक आधार।
कर दो हम पर यह उपकार, बख़्शो हम सबको अपना प्यार।
हे मेरे परमपिता, मेरे सर्वस्व, मेरे प्राण, आपके श्री चरणों में ही पाएं हम स्थान।
गायें हम आप ही के गुणगान, रहें हम आपके ही शुक्रान, शुक्रान, शुक्रान।
आज के पत्र में बस इतना ही।
आपकी बेटी,
मीना आनंद

मीना आनंद के और लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें: https://nazmehayat.com/members/meena/
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1 Comment
  • Anju khan
    Posted at 21:46h, 07 November Reply

    Beautiful, very nicely written.

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