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खिड़की

खिड़की

हाँ ये खिड़की ही तो है,
जिसके कंधों पर दीवार का बोझ है,
दीवार ने अपना बोझ खिड़कियों पर डाल रखा है,
बड़ा दुख होता है यह देख कर,
कितना बोझ उठा रखा है खिड़कियों ने,
तकलीफ होती होगी खिड़कियों को,
कैसे सहती हैं ये सब खिड़कियाँ,
और कुछ कह भी नहीं सकती,
चुपचाप बस सहे जा रही हैं,
बिना कुछ कहे,
कब तक चलेगा ऐसा?
किसी दिन अगर खिड़की में जान आ जाए, तो हो सकता है वह भाग जाएं और कहें कि नहीं रहना है मुझे तुम्हारी इस दीवार में जहाँ मुझ पर इतना दबाव बनाया जा रहा है
मैं जा रही हूँ घर छोड़ कर,
उस दिन क्या होगा?
तब हमें हवा कहाँ से आएगी,
तब कहाँ से धूप लेंगे हम,
तब कहाँ टांगेंगे पर्दे।
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