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मेरे नए साल का संकल्प

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हर-बार मुझे यूँ एहसास होता है कि मुझमें ख़ामियाँ शायद बहुत हो गई हैं, अब मुझे ख़ुद को बदलना है।
जी हाँ…! सही सुना आपने, मुझे ख़ुद को बदलना है।
लेकिन कैसे……??
नाम बदलकर!
लेकिन मैं बचपन से ये सुनता आ रहा हूँ कि इंसान की पहचान उसके नाम से नहीं होती है, ना जाने इस दुनिया में एक-जैसे कितने इंसान होते हैं लेकिन नाम किसी का भी नहीं होता है।
     तो काम बदलकर...!
लेकिन काम से भी इंसान कि पहचान बरकरार नहीं रहती है, हाँ कुछ हद तक उसकी निसबत उस काम से ज़रूर जुड़ जाती है मगर उसकी पहचान हर-ग़िज़ नहीं होती है।
अब समझ नहीं आ रहा है फिर कैसे बदलूँ ख़ुद को..?
किरदार बदलकर…..!
किरदार बदल कर... लेकिन क्या फिर मैं वो मैं ही होऊंगा..?
जिस अंदाज़ से मैं सोचता हूँ, जिस अंदाज़ से बोलता हूँ या जिस अंदाज़ से मुख़ातिब होता हूँ तो वो सब बदल जाने से मेरे अंदर मेरा वजूद बाक़ी रहेगा। हाँ... शायद वो मैं ही होऊँगा मगर मैं ही नहीं होऊँगा।
मैं खुद को इस तरह नहीं बदल सकता!
किरदार का बदलना अंदाज़ बदलना नहीं होता है, बोल-चाल बदलने से मुराद किरदार का बदलना नहीं होता है, मुख्तलिफ अंदाज़ से मुखातिब होना किरदार का बदलना नहीं होता है।
तो फिर?
किरदार का बदलना अंदाज़ बदलना नहीं, बोलचाल बदलना नहीं बल्कि सोचने का नजरिया बदलना होता है, खयालात बदलना होता है और एहसास-ओ-जज़्बात बदलना होता है। और जब ये बदल जाते हैं तो इंसान का नजरिया बदल जाता है और जब नजरिया बदलता है तो अंदाज़ बदल जाता है और जब अंदाज़ बदलते हैं तो काम भी बदल जाते हैं और जब काम बदलते हैं तो इंसान बादल जाते हैं लेकिन जिस्म वो ही होता है , नाम भी वो ही होता है लेकिन किरदार मुख्तलिफ हो जाता है और जब किरदार मुख्तलिफ और सबका प्यारा होता है तो वो खुशियों का गहवारा बन जाता है।
मेरा भी नए साल का संकल्प यही है कि मैं भी अब अपना किरदार बदलूंगा, अपनी सोचों को ख़ुद तक महदूद नहीं रखूंगा और अपने खयालात को यूंही ज़ाया नहीं होने दूंगा बल्कि अब क़लम और स्याही का ऐसा मुअम्मा पेश करूंगा कि सब पढ़ने पर मजबूर हो जाएं, अपने नाम को बेनाम नहीं रहने दूंगा बल्कि सब तक ये नाम पहुंच जाए कुछ ऐसा काम करूंगा... हाँ मैं अब अपना किरदार बदलूंगा।
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