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मेरा जीवन, एक कोरा काग़ज़

मेरा जीवन, एक कोरा काग़ज़

कहते हैं, इंसान आता है,
खाली हाथ,
और जाता भी है,
खाली हाथ।
लेकिन मेरे विचार से,
लेकर आता है वह,
अपने पिछले जन्मों के संचित कर्म,
और लेकर जाता है,
इस जीवन में किये,
अच्छे या बुरे कर्म।
एक शिशु जब इस दुनिया मे
खोलता है अपनी आँखें,
तो उसका काग़ज़,
होता है बिल्कुल कोरा।
जैसे जैसे होता जाता है बड़ा,
लिखता है कोरे काग़ज़ पर,
खुद हीअपनी तकदीर।
जिस पर छपी होती है,
उसके अपने ही कर्मों की तस्वीर। 
अच्छे या बुरे सब कर्मों का,
लेखा जोखा ही करता है निर्धारित,
उसका अगला जन्म।
तो क्यों ना हम,
अपने जीवन के कोरे कागज़ को,
भर दें सुंदर अक्षरों से,
सुंदर भावों से व सुकर्मों से।
क्यों ना हम समझ लें,
अपने जीवन का मर्म,
औरकर जायें हम,
जीवन में शुभ कर्म।ताकि अपने परमपिता को,
मुंह दिखाने में आये न शर्म।
कोरे कागज़ पर अगर,
अच्छी होगी तस्वीर,
तो हमारी और भी अच्छी होगी तकदीर।

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