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मयखाना

मयखाना

मयखाने के दरवाज़े खुलते हैं अंदर की ओर,
हर आने वाला अपनी रूबाई सुनाता है।
कुछ गम के साए में मजबूर,
कुछ अपनी तन्हाइयों से दूर।

हर प्याले में होता है जाम,
अपने हरषु के लिए बेताब,
किसी का गम गलत करने को,
तो किसी की खुशी को करने बेताब।

हर जाम की एक कीमत होती है,
जितनी पीओ उतनी उम्र लंबी होती है,
वो क्या जानें जिन्होंने कभी लगाया नहीं जाम लबों से अपने,
उसकी तासीर कैसे दिलों को सुकून और जिस्मों को जवां करती है।

कम हो सकती है तासीरे मोहब्बत इक बार,
तासीर मय की कम नहीं हुआ करती,
बेसाख्ता, पूछा किसी ने मयखाने में,
क्या होती है जामे उम्र।

वो क्या जानें जिन्होंने चखा नहीं तासीरे मय का प्याला,
के मय की उम्र उसकी तासीर से होती है,
मय जितनी पुरानी हो उतना ज्यादा नशा करती है।
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