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ये पुस्तक पता नहीं अब तक कितनी बार पढ़ चुकी हूँ। औऱ आगे कितनी बार पढूंगी। उसका पहला पन्ना भी फट चुका है फिर भी दिल से सभाल के रखी है। ये किताब ना कहा जाये मेगज़ीन जैसी है, विजय गुप्त मौर्य ने लिखी है गुजरती वर्शन,...

हम हिंदुस्तानियो की रगों में खून नहीं चाय दौड़ती है ऐसा ही कुछ हम सब ने कही न कही कभी न कभी कुछ सुना ही होगा। और चाय से जुड़े इस रिश्ते को मैं कुछ यूँ कहता हूँ कि- मत निभाना कोई रिवाज़ मेरे हाल पूछने का, किसी...

इंसान गलतियों का पुतला है। हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी कोई छोटी या बड़ी गलती या गलतियाँ ज़रूर करते हैं। हममें से कुछ लोग एक ही गलती को बार- बार दोहराते हैं और अपनी पिछली गलतियों से भी कोई सबक नहीं लेते...